Wednesday, 17 April 2013

यूपी पुलिस ने बच्चे को दिया करंट व जूतों से पीटा

To,
       The Chairperson
       National Human Rights Commission
        New Delhi
 Dear Sir,
        I want to bring in your kind attention towards the news published in Amar Ujala on 7th February, 2013 यूपी पुलिस ने बच्चे को दिया करंट व जूतों से पीटा http://www.amarujala.com/news/states/uttar-pradesh/five-year-old-child-tortured-by-lucknow-police/
 यूपी पुलिस ने बच्चे को दिया करंट व जूतों से पीटा लखनऊ/ब्यूरो | Last updated on: February 7, 2013 8:53 AM IST टैग्स » five year old child, up police, torture
      ‘मैं अपने घर के पास के शिव मंदिर में रोज प्रसाद खाने जाता हूं। उस दिन भी गया था, लेकिन कुछ लोगों ने मुझे चोर बताकर पकड़ा और घर ले आए। वहां से पुलिस के पास ले गए। मैं चिल्लाता रहा कि मैंने कुछ नहीं किया... किसी ने नहीं सुनी। पुलिस ने मुझे हवालात में बंद किया और रात भर मारा और चोरों का पता पूछते रहे। मुझे नहीं मालूम था, कौन चोर हैं? इसलिए कुछ नहीं बता सका। फिर उन्होंने मेरे कान पर बिजली के तार लपेटे और करंट देने लगे। पहले 8-10 बार करंट दिया। मैं चिल्लाता रहा, रोता रहा, वो नहीं रुके। उन्होंने मुझे काफी देर तक करंट दिया और जूतों से मारा।’ यह दर्दनाक कहानी साढ़े पांच साल के उस मासूम की है, जिसे लखनऊ पुलिस ने चोरी के इल्जाम में पकड़कर अमानवीय यातनाएं दी। वाकया आलमबाग के विजयनगर का है और यह भयानक करतूत कृष्णानगर पुलिस की है। मासूम अब भी सदमे में है। बुधवार को उसे किशोर न्याय बोर्ड के सामने पेश किया गया, जहां उसकी हालत देख बोर्ड ने उसे तत्काल जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया। घटना के बाद से परिवार सहमा हुआ, सदमे में है। कृष्णानगर पुलिस ने दो फरवरी को क्षेत्र में हुई एक चोरी के इल्जाम में कक्षा एक में पढ़ रहे सुदीप (नाम परिवर्तित) को गिरफ्तार किया। सुदीप के पिता बताते हैं कि कुछ लोगघर में सुदीप को लेकर आए और यह कहते हुए फिर उठाकर पुलिस के पास ले गए कि उसने चोरी की है। वे उस रात डेढ़ बजे तक कृष्णानगर पुलिस थाने में अपने बच्चे से मिलने के लिए बैठे रहे लेकिन उन्हें बच्चे से मिलने नहीं दिया। वे बाहर बैठे रहे और अंदर उनके कलेजे के टुकड़े को पुलिस वाले बुरी तरह पीट रहे थे। उसकी चीखें पिता बर्दाश्त न कर सके और पुलिस वालों के सामने गिड़गिड़ाने लगे। पुलिस ने उनकी एक न सुनी और वहां से भगा दिया। अगले दिन उन्होंने वकील से संपर्क किया और चालान कटवा कर सुदीप को घर लाए। इस दौरान पाया कि उसकी जैकेट खून से सनी हुई है, कनपटी से खून रिस रहा है। उससे चला नहीं जा रहा था। सुदीप के माता-पिता रोते हुए बताते हैं कि उनके बच्चे ने चोरी नहीं की है। पुलिस अब भी उन्हें तंग कर रही है। लोगों ने पीटकर पुलिस को सौंपा था बच्चा कृष्णानगर थाने के इंस्पेक्टर रामसनेही यादव का कहना है कि नागरिकों ने दो फरवरी की रात सुदीप को एक समारोह में चोरी करते पकड़ा था। उसकी पिटाई करके थाने लाकर पुलिस को सौंपा था। पुलिस ने नागरिकों की तरफ से उसकी गिरफ्तारी की लिखा-पढ़ी की और डॉक्टरी मुआयना कराने के बाद किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष प्रस्तुत किया। उसकी न तो थाने में पिटाई की गई और न ही प्रताड़ित किया गया। मामला संज्ञान में नहीं एसएसपी आरके चतुर्वेदी का कहना है कि कृष्णानगर कोतवाली में किसी बच्चे की पिटाई का मामला उनके संज्ञान में नहीं है। बच्चे या उसके अभिभावक द्वारा कोई शिकायत नहीं की गई है। ऐसी शिकायत मिलने पर जांच कराकर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। Therefore it is a kind request please take appropriate action at earliest.

Thanking You
Sincerely Yours
 Shruti Nagvanshi, Managing Trustee
 Peoples' Vigilance Committee on Human Rights
 Sa 4/2 A Daulatpur, Varanasi - 221002
 Mobile No: +91-9935599330

Friday, 8 March 2013

आम की सूखी डाली से बच्चों की बेरहमी से पिटाई


                     आम की सूखी डाली से बच्चों की बेरहमी से पिटाई

“वाराणसी जिले के बडागाव ब्लाक अंतर्गत प्राथमिक विधालय बड़ेपुर बेलवा में नियुक्त शिक्षक श्री.रामखेलावन दवारा 28 फरवरी 2013 को आम की सूखी डाली से बच्चों की बेरहमी से पिटाई की गयी” मध्याह्न भोजन के बाद बच्चें विधालय परिसर में खेल रहे थे कि गुस्से में शिक्षक श्री रामखेलावन बच्चों के पास आकर उन्हें मारते हुए अपने क्लास में जाने के लिए कहा, चोट खाकर डरे-सहमे बच्चे अपने क्लास में आकर बैठ गये | लेकिन शिक्षक महोदय का गुस्सा अभी भी शांत नहीं हुआ था | उनके द्वारा क्लास पाँच (5)के बच्चों से एक साथ एक से बारह(1-12 ) पाठो पर एक साथ प्रश्न- उत्तर पूछा जाने लगा | सहमें बच्चे ठीक से उत्तर नहीं दे पाये, जिसके बाद शिक्षक महोदय का गुस्सा और बढ़ गया | आग-बबूला शिक्षक दोबारा उसी आम की सूखी डाली से बच्चों की हथेली सामने करवाकर बुरी तरह पीटा इतना ही नही क्लास दो और तीन (2 -3 )के बच्चों को उनके कमरे में जाकर भी पिटाई की उन बच्चों का कसूर था की किसी शिक्षक के न होने के कारण वे आपस में बातें कर रहे थे, जिससे पैदा हुआ ध्वनि उन्हें परेशान कर रही थी|
    शिक्षक के इस गुस्से से 22 बच्चे गंभीर रूप से चोटिल हो गये | इस बीच में शिक्षा मित्र सुश्री ममता द्वारा कई बार उन्हें रोकने कि कोशिश की लेकिन उन्होंने शिक्षा मित्र की एक न सुनी विधालय बंद होने के बाद बच्चे उसी गाँव में स्थित संत कबीर जनमित्र सामुदायिक केंद्र में पहुचे और वहा उपस्तिथि कार्यकर्ता मंगला प्रसाद को अपने पिटाई की बात बताए |मंगला प्रसाद ने तुरंत विद्यालय के इंचार्ज प्रधानाध्यापक श्री प्रभात यादव से फोन पर बात की उनके द्वारा बताया गया की वे घटना के समय विद्यालय में नही थे कल विद्यालय आकर वे उचित कदम उठाएंगे | इसके बाद मंगला प्रसाद द्वारा खंड शिक्षा अधिकारी महोदय से घटना के संदर्भ में बात की गयी जिसके बाद 1 मार्च 2013 को खंड शिक्षा अधिकारी द्वारा विद्यालय और गाँव  में आकर बच्चों एवं उनके माता पिता से बयान लिया गया और जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी महोदय के निर्देश पर शिक्षक श्री रामखेलावन को निलम्बित कर दिया गया | इस खबर को अखबारों में प्रमुखता से प्रकाशित किया गया | मानवाधिकार जननिगरानी समिति के सुझाव  पर 19 बच्चों को टिटनेस की सुई और दर्द निवारक  दवाये दिलवाई गयी |

शिक्षक के इस आक्रामक व्यवहार के संदर्भ में जानने के प्रयास में पता चला कि इन शिक्षक महोदय को आज तक तनख्वाह नहीं मिली है डायट में उनके मार्कसीट मंगायी गयी है जिससे वे धूप से काफी परेशान रहते है |
                         


  

 
   

Sunday, 24 February 2013

बच्चों को भूखे पेट सुला देती हूँ



 कई बार मै अपने बच्चों को भूखे पेट सुला देती हूँ अहमदी ............
                                              
         मेरा नाम अहमदी उम्र 25 वर्ष हमारे शौहर का नाम असलम हैं, ग्राम-मीराशाह ग्राम पंचायत व विकासखण्ड तथा तहसील- पिण्डरा, जिला वाराणसी की निवासीनी हूँ। हमारे दो बच्चें शाहिल उम्र 7 वर्ष,  आस्मिन उम्र 2 वर्ष वजन 6.50 Kg की है, शाहिल गाँव के ही सरकारी प्राथमिक विद्यालय में पढ़ने जाता है। आस्मिन गाँव के आँगनबाड़ी केन्द्र में नामांकित है मगर उसे कोई सेवाये नहीं मिलती, यही नही वह गम्भीर रूप से कुपोषण की शिकार है तब भी उसे आँगनबाड़ी कार्यकर्ती सहित सहायिका देखने तक नहीं आती मैं निहायत गरीब व भूमिहीन परिवार हूँ हमारे पास कोई राशन कार्ड यहाँ तक की मनरेगा जाँब कार्ड भी नहीं है।
       हमारे पास एक झोपड़ी थी मगर वह हर बरसात में उजड़ जाता था मैंने अपने शौहर के साथ मिलकर अपने झोपड़ी के चारो तरफ मिट्टी की कच्ची दीवार बनाकर और उस पर सिमेन्ट की चादर (पत्ता) 15000/- रूपया 120% वार्षिक ब्याज की दर से कर्ज लेकर लगाया |
            हमारे शौहर गाँव में ही किराये पर दुकान लेकर फटे-पुराने कपडो की सिलाई का काम थोड़ा बहुत जो कर लेते हैं, गाँव में सिलाई का दुकान होने के नाते ज्यादा सिलाई का काम नहीं हो पाता है जो सिलाई हो जाता है, उसमें भी आधा से ज्यादा उधारी का सिलाई होता है ज्यादा दबाव बनाकर पैसा नहीं माँगते है कि अगले बार ग्राहक हमारे दुकान पर आयेगा भी नहीं फिर किसका कपड़ा सिलाई करेगे सिलाई प्रतिमाह  1500/- रूपये तक मजदूरी मिल पाता है। इधर जब ब्याजी रूपये का महीना में ब्याज पूरा होने लगता है तो उसके पहले ही साहूकार अपना ब्याज लेने घर पर चला आता है वह अपने पूरे माह का ब्याज माँगने लगता है। जब मैं साहूकार से अपने घर की स्थिति बताती हूँ कि इस माह में सिलाई 1500/- रूपया का हुआ था, खर्चा हो गया अगले माह में ब्याज दे दूंगा मगर वह हमारी जो एक भी नहीं सुनता और डाट कर भद्दी-भद्दी शब्दों का प्रयोग कर हमें झिन-झिनाने लगता है और कहता है कि मैं कुछ भी नहीं सुनना व जानना चाहता हूँ मैं तुम्हारी मजदूरी का ठेका नहीं लिया हूँ ‘‘रूपया लेत समय तो यह नहीं सोच रही थी’’ हमें मूलधन नहीं तो ब्याज चाहिए, दबाव बनाकर जो बचा हुआ रूपया था वह लेकर चला गया। उस समय हमारे घर में खाने के लिए एक भी दाना नहीं था पूरा दिन बच्चें इधर-उधर खाने के लिए गाँव में ही पड़ोसियों के घर भटकते रहे जब शाम हो जाता है और हमसे बच्चों की भूख देखी नहीं जाती तब अपने आस-पास पड़ोसी से खाना माँग कर शाम को खिलाती हूँ। खाना माँगते समय पड़ोसी भी तरह-तरह आवाज-व्यंग बोलते है। उस समय लगता है कि मैं मर क्यों नहीं जाती मगर हमारे बच्चों का क्या होगा सब कुछ सहकर चली जाती हूँ। वह खाना खा कर हमारे बच्चें सिर्फ चुप हो जाते है उनका पेट नहीं भरता वह खाना मांगने की जीद करते है। तो उन्हें मार-पीट कर किसी तरह सुलाती हूँ जब मैं सोचती हूँ कि मैं अपने बच्चों को भर पेट खाना नहीं खिला पा रही हूँ हमारा दिन इतना खराब है तब दिल से से रोने की आवाज तो आती और आंसू रूकने का नाम नहीं लेता कि मैं अपने बच्चों को भूखा सुला रही हूँ।
            यह सब बात मैं अपने शौहर तक को नहीं बताती की ‘‘यह सब हुआ और हमारे बच्चें भूखे सो रहे है’’ यह गरीबी देख आत्म हत्या न कर ले यदि ऐसा हुआ तो हमार और हमारे बच्चों का क्या होगा। यह सब सोच कर हमें रात-रात भर नीद नहीं आती।
            यह गरीबी की स्थिति आज मैं पहली बार बता रही हूँ जो मैं कभी किसी को नहीं बतायी थी। हमने कभी सोचा भी नहीं था कि हमारा कोई दुखड़ा इस तरह सुनेगा। यह सब बताते हुये हमारा मन हल्का हुआ है।

साक्षात्कारकर्ता- मंगला प्रसाद ( मनावाधिकार कार्यकर्ता )                        

पत्थर उबालती रही माँ तमाम रात; बच्चे फरेब खा के चटाई पे सो गए


भूखे बच्चों को चूल्हे पर अदहन चढ़ाकर खाना बनने का भ्रम बनाता हूँ, बच्चे खाना बनने के इंतज़ार में सो जाते है  धन्नू मुसहर ........
                मेरा नाम धन्नू मुसहर पुत्र स्व0 मिठाई मुसहर निवासी रमईपुर मुसहर बस्ती ग्राम पंचायत व विकास खण्ड तथा तहसील-पिण्डरा, जिला वाराणसी का मूल निवासी हूँ। मेरी उम्र ३८ वर्ष हैं  हमारे  दो लड़के व पाँच लड़कियाँ थी जिसमें से दो लड़कियां सुषमा व सरोजा का विवाह हो गया और वह अपने ससुराल चली गयी व एक लड़का राजेश हमसे अलग रहता है इस समय मोनू-12 वर्ष, कुमारी 5 वर्ष व अनिता 6 माह सहित हमारी पत्नी सुदामा हमारे साथ रहती है। मोनू गाँव के सरकारी प्राथमिक विद्यालय में पढ़ता है, कुमारी व अनिता गाँव के आँगन बाड़ी केन्द्र में नामांकित हैं मगर उन्हें आँगनबाड़ी का कोई सेवा नहीं मिलता जिसमें अनिता गम्भीर रूप से कुपोषण की शिकार है यहां तक की आँगनबाड़ी कार्यकर्ती या सहायिका दोनों में से कोई  अनिता को देखने तक नहीं आती मैं निहायत गरीब भूमिहीन हूँ हमारे पास BPL राशन कार्ड है। जिसपर 35Kg अनाज मिलता है उसमें से भी  3-4 Kgअनाज कम मिलता है जिसमें से गेहू एक सप्ताह व चावल 10 दिन तक ही चलता है। हमारे पास मनरेगा जाँव कार्ड है मगर उसपर कभी-कभी ही काम मिलता है काम करने के एक दो माह बाद उसका मजदूरी मिलता है। मैं दिहाड़ी मजदूरी के साथ दोना-पत्तल बनाने का काम करता हूँ आठ माह तक गाँव में ही आस-पास खेतिहर मजदूरी व दिहाड़ी मजदूरी का काम करता हूँ जिसमें कभी काम मिलता है तो कभी काम नहीं मिलता घर में भी कभी खाना बनता है तो कभी खाना नहीं बनता जिस दिन खाना बनता है तो दिन भर में एक समय सुबह ही खाना बन पाता है तो शाम को  नहीं बन पाता है | सुबह जब भी खाना बनने लगता है तो बच्चें खाना बनने वाली हडीयाँ के पास बैठ कर इन्तजार करते है कि अब खाना बनेगा और मिलेगा हमारे बच्चों को खाना खाने को तो मिलता है, मगर कभी पेट भर खाना नहीं मिलता है। हम दोनो पति-पत्नी को तो आये दिन बीना खाये ही सोना पड़ता है।   
                आषाढ़, सावन, भादो के महिना में मैं अपने घर का रोजी-रोटी चलाने के लिए पूरे परिवार के साथ इलाहाबाद के पड़गड़ के जंगल में पत्ता तोड़कर दोना पत्तल व लकड़ी तोड़कर बेचने का काम करता हूँ जब तेज बरसात होता है तो वापस अपने गाँव चला आता हूँ। ‘‘अपने लड़की के शादी के लिए 10,000/- रूपया 60% प्रति वर्ष की दर से ब्याज लिया हूँ’’ जो कमाई होता है उसका ब्याज भर देता हूँ। तब घर वापस आने के बाद  ना ही हमारे पास अनाज व पैसा नहीं बचता इस स्थिति में आस-पास की दुकान से कर्ज लेकर किसी तरह अपने बच्चों को खिलाती हूँ इस बार लगातार पाँच दिन तक बूँदा बाँदी कर बरसात होता रहा हमारे घर में खाने को एक दाना नहीं था हमारे बच्चे भूख से तड़प रहे थे। उस समय पूरे बस्ती में वही स्थिति थी, किसी के घर चूल्हा नहीं जल रहा था मैं पिण्डरा बाजार में गया की दुकान से कुछ बच्चों के खाने हेतु आटा-दाल लाऊ मगर हमारे पास एक भी फूटी कौड़ी पैसा नहीं था दुकान वाला झिन-झिना कर भगा दिया और कहा कि तुम हमारा पैसा कहा से लाकर दोगे उधार सामान नहीं मिलेगा। इसी तरह मैं चार दुकान पर गया मगर कोई सामान नहीं दिया मैं वापस घर आ रहा था तब हमें लगा कि आज मैं कितना विवस हूँ की अपने बच्चो को दो वक्त का रोटी नहीं दे सकता हमसे अच्छा तो हमारे गाँव का कुत्ता है जो सुबह शाम अपने बच्चे को खाना लाकर देता है।
                जब मैं घर वापस आया तो हमारी पत्नी व बच्चे राह देख रहे थे कि कुछ आयेगा और घर में खाना बनेगा हमसब मिलकर खायेगे बच्चे रो रहे थे। तब मैं अपने पत्नी को कहा की चूल्हा जला दो और उसमें अदहन लगा दो तब बच्चे और करीब चुल्हे के पास आकर बैठ गये अब बनेगा और मिलेगा धीरे-धीरे बच्चे खाना का इन्तजार करते-करते सो गये और सुबह उठकर खाना माँगने लगे तब मैं कहा की तुम सब सो गये कुत्ता खाना खा गया। सुबह बरसात बन्द हुआ और मैं एक पेड़ से जाकर सूखा लकड़ी तोड़कर बाजार में बेचा और बच्चो को खाने का सामान लाया तब हमारे बच्चे खाना खाये। यह सब बताने पर हमें फिर उस दिन की कहानी याद आ रही है यह सब बताने पर हमारा मन हल्का हुआ।
 
साक्षात्कारकर्ता -मंगला प्रसाद (मानवाधिकार कार्यकर्ता )