Thursday, 16 January 2014

गाँव –गाँव तक पहुंचा बेटी ही बचायेगी

 



गाँव –गाँव तक पहुंचा बेटी ही बचायेगी  




गाँव –गाँव तक पहुंचा बेटी ही बचायेगी अभियान - बेटी के हक़ में लिया शपथ
15 जनवरी 2014 को अमर उजाला की अनूठी पहल बेटी ही बचायेगी अभियान के तहत मकर संक्रान्ती के अवसर पर  मानवाधिकार जननिगारानी समिति , जनमित्र न्यास एवं सावित्री बाई  फुले महिला पंचायत से जुड़े मानवाधिकार पक्षकारो सहित सैकड़ो लोगो ने बेटी के हक़ में लिया शपथ | यह टीम चिरईगाँव ब्लाक के सरायमोहाना में पंहुँच कर बेटी के संदर्भ में जागरुक करते हुए शपथ ग्रहण कराये इस क्रम में दी लाईट क्लासेस कोटवा, सरायमोहाना के शिक्षक,शिक्षिका व बच्चों ने भी इस कार्यक्रम में अनूठी पहल दिखाई, जिसमे मुख्य रूप से कीर्ति, आकांक्षा मौर्या, प्रज्ञा मौर्या, आशीष प्रकाश, बिपिन चौधरी, अवनीश सिंह राठौर, अवनीश शुक्ला ब्रिजेश रहे |  
विदित हो की यह समिति पिछले 4 वर्षो से दलित, वंचित व अल्पसंख्यक समुदाय की 45 लड़कियों को पूर्व माध्यमिक, माध्यमिक एवं उच्च शिक्षा जारी रखने के लिए आर्थिक मदत कर रहा है | साथ ही बाल विवाह के खिलाफ बड़ा अभियान खडा किया है |

Tuesday, 7 January 2014

खोया हुआ अमालुद्दीन वापस गया घर



खोया हुआ अमालुद्दीन वापस गया घर
अमालूद्दीन उम्र 11 वर्ष माता का नाम-आसमा खातून, पिता का नाम- मो० मोबिन,निवासी- आत्माराम कटरा, चिमली मिल, मैट्रो रोड, थाना- सदर, पुरानी दिल्ली | अमालुद्दीन से बड़ा दो भाई एक बहन तथा दो भाई छोटे हैं, अमालुद्दीन कक्षा 2 में पढ़ता था घर की आर्थिक स्तिथि खराब होने के कारण पढकर आने के बाद अपने अब्बू के साथ घर पर ही चल रहे मोल्डिंग ( प्लास्टिक का छोटा-छोटा ढक्कन बनाना ) मशीन भी चलाया करता था जिससे विद्यालय का मिला घरेलू काम भी पूरा नही हो पता था, धीरे-धीरे अमालुद्दीन पढ़ने में कमजोर हो गया दुसरी तरफ उसे खेलने का मौका भी नही मिलता था इसके बाद धीरे-धीरे वह पढ़ने जाना ही कम कर दिया और काम से मौका मिलने पर वह बड़े बच्चों के साथ दोस्ती कर रहने लगा उन लोगो के साथ रहते-रहते वह पैसा खेलने का बुरी लत पकड़ लिया | जिसको लेकर इसके अब्बू आये दिन मरते-पिटते रहते थे कि पैसा खेलना छोड़ दे लेकिन अमालुद्दीन पैसा खेलना नही छोड़ा | इसी तरह 10 दिसम्बर 2013 को सुबह पैसा खेल रहा था की उसके अब्बू देखने के बाद पिटाई करने लगे मौका पाते ही अमालुद्दीन वहा से भाग निकला घर पहुचते अम्मी का रखा 1000/- रुपया ( जो पहले से देख रखा था ) लेकर साथ में नई दिल्ली रेलवे स्टेशन की तरफ भागा तथा रास्ते में जाते-जाते अपने मामा शहीद पुत्र दाऊद निवासी- बिगरा टोला, बन्नी डीह, जिला- मधुबनी, बिहार के घर जाने का योजना बनाया मामा के घर जाने वाली स्वतंत्रता शेनानी ट्रेन का नाम याद रखा था मगर अन्जाने में दिल्ली से आरही शिवगंगा इक्सप्रेस वाराणसी में ही  अमालुद्दीन चढ़ गया ट्रेन चलने के लगभग 2 घंटा बाद GRP ने उसे पकड़ लिया | जिसपर PVCHR कार्यकर्ता द्वारा JJ Act. को लेकर बहस हुआ तब GRP ने कार्यकर्ता के पास ही अमालुद्दीन को छोड़ चला गया |इसके बाद ट्रेन में ही अमालुद्दीन से दोस्ती कर विस्तृत  बात कर 11 दिसम्बर 2013 को सुबह 11:40 पर वाराणसी RPF उप निरीक्षक से बात कर चाइल्डलाईन डेयर संस्था के डायरेक्टर मंजू जी से बात कर उनके कार्यकर्ती रिमझिम देवी को अमालुद्दीन के पास मिले 902/-रुपयें के साथ लिखित रूप में सुपुर्द किया इसके बाद मोबाईल से सम्पर्क कर जानकारियां लेता रहा दुसरे दिन अमालुद्दीन JJB में पेश हुआ इसके बाद वहा से मात्री छाया संस्था में रखा गया मात्री छाया द्वारा दिल्ली के सदर थाना में फ़ोन कर अमालुद्दीन के अब्बू से बात कर उनके अब्बू दिल्ली पुलिस के साथ मात्री छाया संस्था में आये अमालुद्दीन को 14 दिसम्बर 2013 को वापस घर लेकर गये|
riport by Mangala Prasad
mo- 09919193917
******



Thursday, 26 December 2013

मुजफ्फरनगर के दंगा पीड़ितों के राहत शिविर का सच : कराहती मानवता




मुजफ्फरनगर के दंगा पीड़ितों के राहत शिविर का सच : कराहती मानवता
23 दिसम्बर को दोपहर के समय मुजफ्फरनगर शाहपुर कैम्प से दंगा पीडिता मैहरुनिसा का मुझेफोन आया, कि हमें कैम्प से जबरजस्ती हटा दिया गया है, हमारे पास रहने का कोई ठिकाना नही है हम कंहा जायें ? खुदा के वास्ते आप हमारी कुछ मदद कीजिये, हमेंआपके मदद की जरूरत है| मैहरुनिसा रो रोकर बार-बार मदद की गुहार लगा रही थी वह बार बार कह रही थी की इतनी ठंढ में मैं कंहा जाऊ ? इस समय मैं इसी गावं के गोकुलपुर में एक मकान के बाहर बरामदे में अपने छोटे-छोटे बच्चों और सास के साथ हूँ |मेरे जैसे कई परिवारों को मदद की जरूरत है जिनका कोई ठिकाना नही है | मदरसे वालों ने हमारा टेंट अचानक ही उजाड़ दिया, हम गुहार लगाते रहे उन्होंने हमारी एक नही सुनी | हमने इस घटना की सूचना तुरंत ईमेल और डाक द्वारा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री माननीय श्री. अखिलेश यादव जी, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, और केंद्र सरकार को दिया और उनसे अविलम्ब इन दंगा पीडितो की सहायता के लिए हस्तक्षेप की अपील की |
हमारी चार सदस्यी टीम, जिसमें डा. लेनिन रघुवंशी (निदेशक मानवाधिकार जननिगरानी समिति), मेरठ के सुप्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता मेजर डा. हिमांशु सिंह, मानवाधिकार कार्यकर्ता मोहम्मद ताज और मैं श्रुति नागवंशी (संयोजिका वायस ऑफ़ पीपुल, उत्तर प्रदेश)21 दिसम्बर 2013 को शाहपुरगाँव के इस्लामिया मदरसे के खुले आसमान के नीचे अस्थाई रूप से बनाये गये कैम्प मेंमुजफ्फरनगर के दंगा पीड़ित परिवारों से मिलने पहुचे | इनमें से कई परिवार कंही जा चुके थे | जो रह गये, वे मुख्यतः दिहाड़ी, मजदूर ईट भट्ठा मजदूर रह गये थे |जिन्हें 23 दिसम्बर को जबरिया उजाड़ दिया गया और कहा गया कि आप अपने घर लौट जायें | सवाल यह है यह मजदूर कंहा जाये जिन गाँवो से इन परिवारों ने भागकर अपनी जान बचायी, वंहा दहशत से वे जाना नही चाहते | वंहा उनके रहने का भी कोई ठिकाना नही रहा, जो कुछ था वह अराजकतत्वो द्वारा छिन्न भिन्न कर दिया गया | लोगों ने बताया कि हमें सरकारी गाड़ी में सर्वे कराने हमारे गाँव ले जाया गया था जब हमने अपने घरों की हालत देखी थी | कुछ के घरों के छत भी उतार लिए गये हैं, उन्होंने कहाकि हमारा घर अब घर नही रहा | हम वंहा जाकर क्या करेंगे, जंहा जान पर बन आयी हो |
 एक पीड़ित ने स्वव्यथा कथा बताते हुए दर्द भरे आवाज में कहाकि, 7 सितम्बर को मन्दौर की उस पंचायत ने हमारी जिन्दगी बदल दी इसके पहले हम अपने गाँव में कई पुश्तों रह रहे थे, हम ठहरे मजदूर हमें जो कोई मजदूरी के लिए बोलता या काम देता हम वही करके अपनी जिन्दगी गुजार रहे थे | लेकिन पंचायत में क्या हुआ ? उसके बाद ही जाटो और मुसलमानों में झगड़ा हो गया, जिसमें दो जाट मारे गये जिनकी लाशें गावं में आने के बाद कोहराम मच गया जाटो का समूह हमें अपने घरों से भगाने पर आमादा हो गये | अगर हम जैसे तैसे भाग कर अपनी जान न बचाते तो मार दिए जाते | वे लोग जो हमारे साथ इतने सालों से प्रेम से रहते आये थे वही हमें जान मारने काट डालने की धमकी दे रहे थे |उनकी आँखों में आग उबल रहा था और हाथों में लाठी डंडे, चापड़ या जो कुछ हथियार या औजार मिला वही लिए थे | हम कुछ समझ ही नही पा रहे थे कि क्या और क्यों हो रहा है | बस हर कोई अपना अपने परिवार की जान किसी तरह बचाने के लिए भाग रहा था | जिसका मुहँ जिस दिशा में उसी तरफ भाग रहा था | हमने कुछ देर और की होती तो हमारी लाशें मिलतीं वंहा | हमें तो हर तरह से दर्द झेलना था हमारे बच्चे हमारे सामने मारे जाते तो भी हम तडपतेऔर हम मारे जाते, तो भी अपनी जान खोने की तडप होती |
शाहपुरा इस्लामिया मदरसे के इस कैम्प में दंगा प्रभावित अलग-अलग गावों सिसोली, हडौली, काकडे, सोरम, गोइला आदि के तीन सौ परिवार रह रहे थे | अब भी वंहा बयालिस परिवार टेंटो में थे जो 23 दिसम्बर को खदेड़ दिए गये | इन परिवारों में पांच गर्भवती महिलाये - अफसाना उम्र 19 W/o वाजिद , 2. परवीन उम्र 30 W/o असलम, 3. शमसीदा उम्र 30 W/o आस मोहम्मद, 4. संजीदा उम्र 26 W/o महबूब, 5. मोमिना उम्र 30 W/o दिलशाद थीं जिन्हें छ: से सात माह का गर्भ था |
काकडे गाँव की शहजाना (उम्र 30 पत्नी कामिल) जो ईट भट्ठा मजदूर है वह जिस दिन गाँव से अपनी और अपने परिवार की जान बचाते हुए भागकर कैम्प में आयी| उसी दिन उसे लडकी पैदा हुई,ऐसे में सास ने ही प्रसव कराया| आठ दिन बादबच्ची निमोनिया से पीड़ित होकर वह गुजर गयी | दवा ईलाज के लिये अपने पास से हो सका किया, लेकिन बच्ची नही बची |शबाना (उम्र 20 पत्नी नफीम) को कैम्प में आने के दो महीने बाद लडकी पैदा हुई, वह भी निमोनिया से पीड़ित होकर एक हफ्ते बाद गुजर गयी | परवीन (उम्र 30 पत्नी असलम) ने बताया कि, हम कलेजे पर पत्थर रखकर कैम्प में रह रहे हैं | जब हम किसी जरूरत का सामान लेने के लिए आसपास के दुकानों में जाते हैं तो लोग बाग हमें देखकर बोलियां बोलते हैं, की ये लोग कैम्प में कम्बल और राहत के सामानों के लालच में पड़े हैं इनकी तो मौज है हम सुनकर भी अनसुना कर देते हैं | यंहा हम इनकी शरण में हैं क्या कहें, खुदा किसी को ऐसे दिन ना दिखाए | रात में हमारे चूल्हे में कुत्ते के बच्चे आकर सो जाते हैं और सुबह उसी चूल्हे में हम खाना पकाते है हमारा ईमान भी खराब हो रहा है लेकिन खुदा सब देख रहा है वह हमें माफ़ करेंगें |
हडौली गाँव की मैहरुनिसा ने हमें बताया की दंगे में मेरे पति सत्तारलापता थे मैं मेरी सत्तर वर्षीय बूढी सास शरीफन रह रहकर बेचैन हो जाते कि उनका क्या हाल होगा ? कंहा होंगे ? सात दिन बाद खतौली में उनका पता चला जब उनकी कहानी सुनकर हमारे पाँव तले जमीन खिसक गयी | जब शाम को मेरे पतिजब फेरी के कपड़े बेचकर घर आ रहे थे तो उन्हें तीन जाटो ने उन्हें मोटरसाईकिल से दौड़ा लिया था,वे किसी तरह गिरते पड़ते अपनी जान बचाने के लिए भाग रहे थे | लेकिन डाक्टर साहब के दुकान के पास उन जाटो ने मेरे पति को घेर लिया और उन्हें गिराकर उनकी गर्दन पर हथियार से वार करने ही वाले थे कि डाक्टर साहब ने उन्हें रोकने की कोशिश की वे मानने को तैयार नही थे | उन्होंने मारने का कारण भी पूछा, जवाब में उन्होंने कहाकि बस ऐसे ही इसे मारना है |उनके बीच बचाव के बीच ही मेरे पति जान बचाकर भाग निकले | वे डाक्टर साहब भी जाट थे,लेकिन उनकी वजह से ही मेरे पति की जान बच गयी | यदि वे न होते तो शायद मेरे पति मार दिए जाते | हम उनके लाख-लाख शुक्रगुजार हैं कि उन्होंने उन तीन जाटो को रोका जो मेरे पति को मरना चाहते थे | दहशत से उनकी तबियत बहुत खराब हो गयी थी |अपने नाक की सोने की लौंग और कान का कुंडल बेचकर बहुत दिन ईलाज कराया | अभी भी वे बहुत डरे सहमे हैं, तबियत हमेशा खराब ही रहती है | इसी से उन्हें मेरी बहन ने अपने घर में शरण दिया है | मैं अपनी सास और बच्चों के साथ कैम्प में हूँ, आखिर रिश्तेदारों पर बोझ तो नही बन सकते हैं |
 सिसौली गाँव की छोटी (उम्र 28 पत्नी इदरीश) जिसके तीन माह का बच्ची अक्शा का जन्म यहीं कैम्प में हुआ, दंगे के समय उसका भाई यासीन सिसौली में ही था उसे तलवार से चोट आ गयी थी, जिसका ईलाज शाहपुर में ही कराया | उस समय ईलाज की कोई व्यवस्था नही थी, इस समय वह अपने घर चला गया है उसे कोई मुवावजा भी नही मिला |खातून (उम्र 35 पत्नी नूरहसन) जिसका ढाई महीने का बच्चा है कई ऐसे छोटे बच्चे हैं जिनके देखभाल और ईलाज की कोई सुविधा नही मिली | चौंकाने वाला तथ्य यह सामने आया कि सोरम, सिसौली, हडौली, और गोइला गाँवो के दस पन्द्रह घरों के जो दंगे पीड़ित शाहपुर कैम्पों में रह रहे थे, उन्हें प्रशासन ने दंगा पीड़ित नही माना | सिसौली और सोरम जंहा अपने खाप पंचायतो के लिए जाना जाता है, विदित है कि वंही सिसौली प्रसिद्ध जाट किसान नेता का गाँव है | महिलाओं ने बताया कि सोरम में उनके कपड़े उतारे लिए गये, उन पर गोलिया चली, तेजाब फेंका गया,किसी तरह से वे जान बचाकर भागे, पुलिस ने भी उनकी पिटाई की | अभी एक दिन पहले ही सोरम मेंमुस्लिम बच्चों की स्कूल से लौटते समय पिटाई की गयी | हडौली में मस्जिद फूंक दी गयी,वंही दुल्हेरा के हकिमु की बेटी सलेहरा अभी भी गायब है |
 हमने देखाकि बारिश से कैम्प की मिट्टी गीली हो गयी थी कई जगह पानी भी इक्टठा था, कुछ टेंटो की जमीन में बिछी पुआल भी पूरी तरहगीली थी | महिलाए और बच्चे हमें अपने टेंटो में ले जाकर दुर्दशा दिखाकर अपना दर्द हमें बता रहे थे | उन्होंने बताया की ठंढ में हम रात भर जागकर किसी तरह बिताते हैं, ठंढ के मारे नींद नही आती | ठंढ में हमारेबच्चे ज्यादा बीमार हो जा रहे हैं| दंगे के कुछ दिन बाद एकाध बार दवा मिली डाक्टर आये, फिर कोई नही आया | हमारे तन पर जो कुछ था, उसे बेचकर हम अपने बच्चों का ईलाज कराते हैं | अभी भी कई छोटे बच्चे, नवजात बच्चे और उनकी माँऐ, गर्भवती महिलाए जिन्हें आम तौर पर खास देखभाल की जरूरत होती है वे इस हाड़ कपा देने वाली ठंढ में खुले कैम्पों में जरूरी सुविधाओं के अभावों में रहने को मजबूर हैं |
यूरोपियन यूनियन नेएक लाख पचास हजार यूरो आक्सफेम संस्था के द्वारा मुजफ्फरनगर और शामली केदंगा  पीडितो की सहायता के लिएदेने की घोषणा की है | वंही क्राई संस्था बच्चों की मौतों की खबरों को संजीदगी से लेकर सीधे मदद करने का निर्णय लिया है | मुजफ्फरनगर और शामली के के कैम्पों में, (9804) नौ हजार आठ सौ चार बच्चों की गिनती की गयी थी, जिनमें कई बच्चे मौत का शिकार हो चुके हैं | अभी भी कई बच्चे और गर्भवती महिलाए थीं, जिन्हें देखभाल और चिकित्सीय सुविधाओ के आभाव में जूझ रहे हैं जिन्हें मदद की जरूरत है | पिछले ही वर्ष दिसम्बर माह में निर्भया के साथ बलात्कार की घटना पर जंहा देश भर में विरोध और भर्त्सना की गयी | वंही मुजफ्फरनगर के दंगा पीड़ित महिलाओ के साथ 5 नवम्बर 2013 तक 13 बलात्कार की घटनाओं पर नागर समाज की आश्चर्यजनक चुप्पी सवालिया निशान है |
मुजफ्फरनगर की साम्प्रदायिक हिंसा कथित छेडछाड की घटना के बाद हत्या कर देने और बाद में छेड़छाड़ की बात न आने की कहानी जंहा एक तरफ हिन्दू फांसीवादी ताकतों के साथ मुस्लिम साम्प्रदायिक ताकतों को रेखांकित करती है | सुप्रसिद्ध अमेरिकन चिंतक एडमन बर्के के इस बात को सही सिद्ध करता है कि “ इस देश में धर्म का कानून, जमीन का कानून, इज्जत का कानून सब मिलाकर एक साथ एक पुरुष के कथित आध्यात्मिक कानून से जुड़ा है जो उसकी जाति है ” |
चूँकि वर्तमान में शासन के निर्देश पर प्रशासन द्वारा जबरिया कैम्पों में रह रहे दंगा पीड़ितों से कैम्प खाली कराया जा रहा है, जिनका घर-बार उजड़ चुका है और अपने गाँव में भी उनकी कोई पुश्तैनी सम्पति, ठौर ठिकाना साथ ही एक नागरिक के हैसियत की बुनियादी सुविधाए और कल्याणकारी योजनाओं (राशनकार्ड, मनरेगा-जाबकार्ड) से कोई सम्बधता नही है, ऐसे परिवार दर–दर की ठोकर खाने को मजबूर हैं | दंगा प्रभावित गांवो से दंगे के कारण विस्थापित परिवारों की पहचान कर उनकी खाद्य सुरक्षा, आजीविका, आवास, महिलाओं और बच्चों के लिए बुनियादी स्वास्थ्य देखभाल सुविधाए, बच्चों की प्राथमिक और पूर्व प्राथमिक शिक्षा के लिए विशेष कार्यक्रम चलाये जाने की जरूरत है | मनोवैज्ञानिक इस बात से सहमत होंगे कि इन परिवारों को लगातार चिकित्सीय देखभाल की भी आवश्यकता है क्योंकि मावन मन मष्तिक पर किसी भी हिंसक घटना का बहुत ही गहरा प्रभाव पड़ता है जिससे उनके अंदर विभिन्न प्रकार की शारीरिक समस्याए पैदा हो जाते हैं जिससे उनकी कार्यक्षमता और दक्षता, निर्णय लेने की क्षमता, आत्मविश्वास प्रभावित होता है, साथ ही ठंढ के मौसम में इस क्षेत्र का तापमान काफी नीचे होता है जिसका प्रभाव बच्चों पर पड़ता है जब चिकित्सा की विशेष जरूरत है |    
ऐसे में जरूरत है कि विभिन्न राजनैतिक पार्टिया अपनी –अपनी रोटियाँ सेंकने के और जनता को गुमराह करने व एक दुसरे पर दंगे की जिम्मेदारी डालने के बजाय दंगा पीड़ितों के तन से गहरे मन के घावों को भरने के प्रयास में मिलकर काम करें | पीड़ितों के इज्जत, आशा, मानवीय गरिमा को ध्यान में रखते हुए अविलम्ब बिना किसी भेदभाव के नागरिक अधिकार संरक्षित करते हुए पुनर्वासित किये जाने की लम्बे समय तक कार्यक्रम चलाना होगा, जिसमें मनोवैज्ञानिक एवं सामाजिक सम्बल के पहल को महत्व देना होगा |
श्रुति नागवंशी (संयोजिका वायस ऑफ़ पीपुल, उत्तर प्रदेश)

















Friday, 20 December 2013

The child rights manifesto signed by various parliamentarians and policy makers in Interface with parliamentarins, policy makers and political parties








The child rights manifesto signed by various parliamentarians and policy makers in Interface with parliamentarins, policy makers and political parties


Mr. Kamal Farooqui, Mr. Bahadur Singh Yadav (Samajwadi Party), Mr. Ali Anwar, (Janata Dal (United), Mr. Daddu Prasad, (Bahujan Samaj Party), Mr. Mohammed Adeeb, (Independent M.P) and Dr. Syeda S. Hameed (Member of Planning Commission and Chancellor, Maulana Azad National Urdu University, Hyderabad) and Mr. Deepak Mishra, President (Chintan Sabha), Mr. Shafiqur Rahman Barq ( BSP), Mr. Shailendra Kumar (Samajwadi Party), Mr. Atul Anjan (CPI), Mr. Colin Gonsalves, Founder Human Rights Law Network. Swami Agnivesh.

Saturday, 16 November 2013

वाराणसी के पिंडरा ब्लाक में आंगनबाड़ी सेवाओं में गुणवत्ता पंहुच एवं संसाधनों की उपलब्धता की धरातलीय स्थिति पर सोशल आडिट



आंगनबाड़ी सेवाओं में गुणवत्ता पंहुच एवं संसाधनों की उपलब्धता की धरातलीय स्थिति
 

मानवाधिकार जननिगरानी समिति द्वारा बाल अधिकार के सरंक्षण एवं संबर्धन के उद्देश्य से संचालित परियोजना क्षेत्र के पिंडरा ब्लाक के पिंडरा ग्रामसभा - रमईपुर, रायतारा, राजेतारा, खरुआपर, एवं मीराशाह में संचालित पांच आंगनबाड़ी केन्द्रों में आंगनबाड़ी सेवाओं में गुणवत्ता, पंहुच एवं संसाधनों की उपलब्धता की धरातलीय स्थिति  अध्ययन किया गया |
महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा बच्चों के पोषण, स्वास्थ्य, शिक्षा, एवं विकास के उद्देश्य से समेकित बाल विकास योजना (ICDS) के अंतर्गत संचालित आंगनबाड़ी केन्द्रों के माध्यम से दी जा रही सेवाओं की गुणवत्ता, पंहुच, और संसाधनो की उपलब्धता की धरातलीय स्थिति की जानकारी के दृष्टिकोण से अध्ययन किया गया, जिससे धरातलीय स्थिति से अवगत होकर सेवाओं में गुणवत्ता सुधार एंव लाभार्धियो की पहुँच सेवाओं तक सुनिश्चित हो सके |
अध्ययन की प्रक्रिया – अध्ययन के एक चरण में आंगनबाड़ी कार्यकर्ती से केंद्र में संसाधनों की उपलब्धता के सन्दर्भ में प्रश्न पूछे गये एवं  दूसरे चरण में लाभार्थी महिलाओं द्वारा सचित्र प्रश्नावली को देखकर पूछे गये प्रश्नों के उत्तर के आधार पर रिपोर्ट तैयार किया गया है | यह अध्ययन पांच आंगनबाड़ी कार्यकर्ती के आलावा इन ग्रामो के कुल एक सौ पैतीस महिलाओं के साथ किया गया है |
आंगनबाड़ी केंद्र की प्राथमिक सूचनाएं - आंगनबाड़ी केंद्र रमईपुर पटेल बस्ती में कार्यकर्ती सुश्री राजकुमारी एवं सहायिका सुश्री मंजू देवी, राजेतारा चमार बस्ती में सुश्री रीना देवी एवं सहायिका सुश्री शशिकला, रायतारा मुसहर बस्ती में सुश्री अनीता देवी एवं सुश्री हंसा देवी, खरुआपर मुसहर बस्ती में सुश्री विजय लक्ष्मी एवं सहायिका सुश्री मीरा देवी, मीराशाह फकीर बस्ती में सुश्री मीना कुमारी एवं सहायिका सुश्री हंसा देवी की नियुक्ति है | इस क्षेत्र की मुख्य सेविका / सुपरवाइजर सुश्री शीला यादव एवं बाल विकास परियोजना अधिकारी (CDPO) सुश्री रुक्मिणी देवी हैं |
आंगनबाड़ी संचालन स्थल – खरुआपर केंद्र मुसहर में विभाग द्वारा निर्मित सरकारी भवन में संचालित है रमईपुर केंद्र पटेल बस्ती में पीपल के पेड़ के नीचे, राजेतारा केंद्र चमार बस्ती में आंगनबाड़ी कार्यकर्ती के घर पर पेड़ के नीचे, रायतारा केंद्र मुसहर बस्ती में पेड़ के नीचे, मीराशाह केंद्र फकीर बस्ती में पेड़ के नीचे संचालित है |
केंद्र में लाभार्थी संख्या –  0-6 माह के कुल बच्चे रमईपुर में 17 की संख्या में हैं, राजेतारा में कुल 12 की संख्या में हैं, रायतारा में कुल 2 की संख्या में हैं, खरुआपर कुल 12 की संख्या में हैं, मीराशाह में कुल 16 की संख्या में हैं |
7 माह से 3 वर्ष के कुल बच्चे रमईपुर में 70 की संख्या में हैं, राजेतारा में  कुल 51 की संख्या में हैं, रायतारा में इस उम्र में किसी बच्चे का नामांकन नही है, खरुआपर कुल 71की संख्या में, मीराशाह में कुल 47 की संख्या में, हैं |
3-6 वर्ष के कुल बच्चे रमईपुर में कुल 60 की संख्या में, राजेतारा में कुल 69 की संख्या में, रायतारा में कुल 63 की संख्या में, खरुआपर 72 की संख्या में, मीराशाह में 43 की संख्या में हैं |
किशोरी बालिकाओं की कुल संख्या रमईपुर में कुल 117 किशोरियों की संख्या है, राजेतारा में कुल 90 किशोरियों की संख्या है, रायतारा में किशोरियों बालिकाओं का नामांकन नही है, खरुआपर में कुल 62 किशोरियों की संख्या है, मीराशाह में कुल 121 किशोरियों की संख्या दर्ज है |
गर्भवती महिलाये रमईपुर में कुल 13 गर्भवती महिलाये, राजेतारा में कुल 11 गर्भवती महिलाये, रायतारा में कुल 16 गर्भवती महिलाये, खरुआपर कुल 6 गर्भवती महिलाये, मीराशाह में कुल 7 गर्भवती महिलाये हैं | इसी प्रकार धात्री महिलाओं की संख्या रमईपुर में कुल 17 धात्री महिलाये, राजेतारा में कुल 12 धात्री महिलाये, रायतारा में कुल 2 धात्री महिलाये, खरुआपर कुल 12 धात्री महिलाये, मीराशाह में कुल 11 धात्री महिलाये हैं |
कुपोषित बच्चों की संख्या जो बताया गया रमईपुर में शून्य, राजेतारा में 1 बच्चा, रायतारा में 2 बच्चे, खरुआपर 2 बच्चे, मीराशाह में 1 बच्चा इस प्रकार कुल 6 बच्चे कुपोषण ग्रस्त सूचि में दर्ज हैं |
इस प्रकार इन पांच आंगनबाड़ी केंद्र में 0 - 6 माह के कुल बच्चों की संख्या 59 है, 7 माह – 3 वर्ष के कुल बच्चों की संख्या 239 है, 3 – 6 वर्ष के कुल बच्चों की संख्या 307 है, किशोरियों की कुल संख्या 390 है, गर्भवती महिलाओं की कुल संख्या 53 है, धात्री माताओं की कुल संख्या 54 है, एवं कुल कुपोषित बच्चों की संख्या 6 है | विदित हो की  संख्या आधारित यह सम्पूर्ण जानकारी आंगनबाड़ी कार्यकर्ती द्वारा दी गयी है |
आंगनबाड़ी केंद्र में संसाधनों की उपलब्धता – आंगनबाड़ी केंद्र पूरी तरह से संसाधनो के आभाव में संचालित हैं     संसाधन विहीन केंद्र किस प्रकार बच्चों एवं महिलाओं के पोषण स्वास्थ्य एवं विकास में सहायक होंगे जब वे खुद ही संसाधन रूपी पोषण के आभाव में कुपोषण से ग्रस्त हैं | इन पांच केन्द्र में से केवल एक केंद्र खरुआपर ही  बच्चों के बैठने के लिए दरी है शेष चार में बच्चे पोषाहार की खाली बोरियों पर बैठते हैं | इसी प्रकार कंही भी बच्चों के लिए खाना पकाने का बर्तन नही है कार्यकर्ती अपने घर से खाना बनाकर लातीं हैं जो की व्यवहारिक नही है की इससे बच्चों को समुचित मात्रा में पोषाहार मिलता होगा | केवल दो केंद्र में ही बच्चों को खाना खाने के लिए टिफिन और कटोरी मिला है शेष तीन केंद्र पर बच्चे कटोरी या थाली लेकर पोषाहार की आस में अपने घर से निकलते हैं यह मानवीय गरिमा को ठेस पहुचाने वाला व्यवहार है | मीराशाह फकीर बस्ती में आंगनबाड़ी कार्यकर्ती द्वारा स्वयं से वहन कर बच्चों के पानी पीने के लिए प्लास्टिक की बाल्टी का इंतजाम किया गया है शेष चार केंद्र में बच्चे हैन्डपम्प से सीधे पानी पीते हैं |
केंद्र में वजन मशीन या तो नही है अगर है तो सही हालत में नही है एसी अवस्था में बच्चो का वजन किस प्रकार सम्भव है किस प्रकार कार्यकर्ती बच्चों का ग्रोथ चार्ट बनाकर बच्चों के पोषण विकास की निगरानी करतीं हैं |
बच्चों की लम्बाई और बांह नापने हेतु अलग – अलग टेप किसी भी केंद्र में नही है , रेफरल पर्ची , पेट के कीड़े मारने की गोली , आयरन की गोलोयाँ किन्ही एक दो केंद्र में ही है साबुन, तौलिया, शीशा कंघी आदि जैसी चीजो की व्यवस्था नही है जिससे बच्चों में साफ सफाई के प्रति चेतना पैदा किया जा सके |
बच्चों को स्कूल पूर्व “पूर्व प्राथमिक शिक्षा” से जोड़ने अक्षर शब्द गीत कविता कहानी आदि कोई सन्दर्भ सामग्री नही होने के कारण कार्यकर्ती बिना शिक्षण कार्य के केवल सतुआ वितरण का केंद्र जाना जाता है |महिलायों और किशोरियों के बीच बेहतर पोषण एवं स्वास्थ्य के लिए शिक्षा कार्यक्रम की सन्दर्भ सामग्री राजेतारा केंद्र के आलावा किसी भी केंद्र में उपलब्ध नही है | एक तरफ लाभार्थी समुदाय के पास अपेक्षित और आवश्यक जानकारियां नही हैं तो दूसरी तरफ सेवा प्रदाताओं द्वाराकमजोर और एवं आधी अधूरी प्रकिया के कारण अति वंचित समुदायों के बीच कुपोषण, रुग्णता, शिशु – बाल व मात्री मृत्यु दरों में कमी कैसे लायी जाएगी |

लाभार्थी महिलाओं का सेवा की प्राप्ति के सन्दर्भ में विचार –ग्राम सभा पिंडरा केरमईपुर, राजेतारा,   रायतारा, खरुआपर एवं मीराशाह सहित कुल पांच टोलों में संचालित आंगनबाड़ी केंद्र से जुड़े लाभार्थिओं से सचित्र प्रश्नावली प्रपत्र को साझाकर उनसे सेवा प्राप्ति के सन्दर्भ में कुल आठ प्रश्न किया गया जिस सन्दर्भ में उनके द्वारा दिए गये उत्तर के आधार पर यह रिपोर्ट तैयार की गयी है | लाभार्थियों द्वारा दिए गये उत्तर के अनुसार रिपोर्ट का सारांश निम्न है |
  सर्वप्रथम लाभार्थी समुदाय से प्रश्न किया गया की क्या उनके बस्ती में आंगनबाड़ी केंद्र पक्के भवन में संचालित है ?  सिर्फ 9.6 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने बताया कि केंद्र पक्के भवन में संचालित है | विदित हो की खरुआपर केंद्र पक्के भवन में संचालित है |
52.6 प्रतिशत ने बताया कि आंगनबाड़ी सहायिका बच्चों को बुलाने आतीं हैं शेष 45.9 प्रतिशत ने बताया कि सहायिका बच्चों को बुलाने नही आतीं हैं | 40.7 प्रतिशत ने यह बताया कि केंद्र में उनके बच्चों को स्कूल पूर्व शिक्षा दी जाती है |  57.8 प्रतिशत ने बताया कि बच्चों को स्कूल पूर्व शिक्षा नही दी जाती है |
क्या बच्चों को आंगनबाड़ी केंद्र में प्रतिदिन पका हुआ भोजन मिलता है इस सन्दर्भ में 76.3 प्रतिशत लोगों ने बताया कि बच्चों को पका हुआ भोजन नही मिलता है | जब गर्भवती और धात्री महिलाओ को पोषाहार मिलने के सन्दर्भ में पूछा गया तब 80 प्रतिशत ने बताया कि हमें यह पोषाहार मिलता है |
समुदाय से जब यह जानकारी लेने का प्रयास किया गया कि क्या उन्हें पोषण स्वास्थ्य की शिक्षा मिलती है जिसके सन्दर्भ में 83 प्रतिशत ने बताया की नही हमें पोषण स्वास्थ्य की कोई जानकारी नही मिलती है | आंगनबाड़ी केंद्र में गर्भवती महिलाओ एवं बच्चों का टीकाकरण होता है इस पर 85.2 प्रतिशत ने बताया की हाँ टीकाकरण होता है | लेकिन जब पूछा गया कि क्या आंगनबाड़ी से गर्भवती महिलाओ को 100 आयरन की गोलियां खाने की सलाह दी जाती है |
*******